मय्य’त का चेहरा देखने का सबसे अहम् मसला…मौलाना तारिक मसूद ने फ़रमाया

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आज हम आपा को यहाँ पर बताने जा रहे हैं कि जब कोई इंसान म’र जाये,तो उसके चहरे को कब देख सकते हैं,क्या नहलाने के बाद याह क़’ब्र के में उतारने के बाद भी देख सकते हैं,इसी सवाल का जवाब हम यहाँ पर आप को देंगे। एक हदीस में आया है कि हज़रत जाबिर रज़ी अल्लाहु ताला अनहु बयान फरमाते हैं कि لَمَّا قُتِلَ أبي جَعَلتُ أبكي، وأكشِفُ الثَّوبَ عَن وَجهِهِ، فجعل أصحابُ النبيِّ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم يَنْهَوْنني والنبيُّ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم لم يَنْهَ

तर्जुमा:मेरे वालिद हज़रत अबदुल्लाह रज़ी अल्लाहु अनहु श’हीद कर दिए गए तो मैं रोने लगा और बार-बार उनके चेहरे से कपड़ा हटाता। सहाबा मुझे रोकते थे लेकिन अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नहीं रोका।सही बुखारी 4080 …बुख़ारी शरीफ़ की एक दूसरी हदीस हज़रत आईशा रज़ी अल्लाहु अनहा से रिवायत है वो बयान करती हैं जबकि नबी की वफ़ा’त हो गई थी।

أقبَل أبو بكرٍ رضي اللهُ عنه على فرسِه من مَسكَنِه بالسَّنحِ، حتى نزَل فدخَل المسجِدَ، فلم يكلِّمِ الناسَ، حتى دخَل على عائشةَ رضي اللهُ عنها، فتيمَّم النبيَّ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم وهو مُسَجًّى ببُردٍ حِبَرَةٍ، فكشَف عن وجهِه، ثم أكَبَّ عليه فقبَّلَه، ثم بَكى

तर्जुमा:हज़रत अबूबकर रज़ी अल्लाहु अनहु अपने घर से जो सनाह में था घोड़े पर सवार हो कर आए और उतरते ही मस्जिद में तशरीफ़ ले गए। फिर आप किसी से गुफ़्तगु किए बग़ैर आईशा रज़ी अल्लाहु अन्ना के हुजरे में आए (जहां नबी करीम सललल्लाहु अलैहि वसल्लम की नाश मुबारक रखी हुई थी) और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ गए।हुज़ूर अकरम सललल्लाहु अलैहि वसल्लम को बुरद हब्रा (यमन की बनी हुई धारीदार चादर ) से ढांक दिया गया था।फिर आपने हुज़ूर का चेहरा मुबारक खोला और झुक कर उस का बोसा लिया और रोने लगे।सही बुखारी 1241

अहादीस की रोशनी में मय्यत का चेहरा देखने के चंद मसाइल मय्यत का चेहरा देख सकते हैं ख़ाह ग़ुसल के बाद,कफ़न के बाद,नमाज़ जनाज़ा के बाद और कोई इन औक़ात में ना देख सका होतो दफ़न से पहले पहले किसी वक़्त देख सकता है।कहीं कहीं पर ये रिवाज बना हुआ है कि एक ही शख्स बार-बार मय्यत को देखते हैं जोकि सही नहीं है।

मय्यत का कोई रिश्तेदार दूर से आने की वजह से तकफ़ीन में ताख़ीर से शरीक हुआ इस हाल में कि मय्यत को क़ब्रिस्तान ले चला गया है और वो मय्यत का चेहरा दीखना चाहता है तो वहां उस के लिए मय्यत का चेहरा देखने में कोई हर्ज नहीं जैसा कि इमाम बुख़ारी ने कफ़नाने के बाद मय्यत के पास जाने पर बाब बाँधा है।

कुछ लोग क़ब्र में मय्यत को उतारकर उस का आख़िरी दीदार करते हैं ये सही नहीं है।जहां मय्यत का चेहरा देखना जायज़ है वहीं इसे बोसा लेना भी जायज़ है जैसा कि अबूबकर रज़ी अल्लाहु अनहु ने रसूल अल्लाह का बोसा लिया।कुछ के यहां घंटों मय्यत के चेहरा को खुला छोड़ देते हैं ताकि आने वाले देखते रहें हालाँकि मस्नून ये है कि मय्यत को चेहरा समेत ढाँप कर रखा जाये जैसा कि नबी को चादर से ढाँपा गया था।

हाँ अगर तजहीज़-ओ-तकफ़ीन में जल्दी मक़सूद हो और कुछ देर के लिए मय्यत का चेहरा खुला छोड़ दे ताकि मय्यत को देखने से लोग फ़ुर्सत पा जाएं और बार-बार चेहरा खोलने की हाजत ना पड़े तो इस की गुंजाइश है।यहां ये बात भी वाज़िह रहे कि मय्यत का सिर्फ चेहरा ही देखा जाये और बदन के बक़ीया हिस्से पर पर्दा हो।

औरत,औरत(मय्यत ) का चेहरा देख सकती है और मर्दों में महारिम का,इसी तरह मर्द ,मर्द(मय्यत) का चेहरा देख सकता है और औरतों में मुहर्रमात का लेकिन अजनबी मय्यत का चेहरा देखना मना है।अगर कोई बहुत बूढ़ी औरत हो तो इस का चेहरा सभी लोग देख सकते हैं।जिस औरत ने मय्यत का चेहरा नहीं देखा इस हाल में कि मय्यत को क़ब्रिस्तान ले चला गया इस औरत को वहां जाकर मय्यत का चेहरा नहीं देखना चाहीए।

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