किस्तों पर सामान खरीदने वाले मौला’ना तारिक मसूद का ये फरमान ज़रूर सुन ले

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आज के दौर में अक्सर चीज़ें क़िस्त पर मिल जाती है,इंसान कोई चीज़ खरीदने जाता है,तो कुछ पैसे अदा कर देता है,बाक़ी पैसे क़िस्त में बांध देता है, हर महीने देता रहता है.आज हम आप को बताएँगे कि क्या इस तरह से सौदा करना इस्ला’म में जा’यज़ है या नहीं है?.क़िस्तों पर चीजों का ख़रीद-ओ-फ़रख़त जाय’ज़ है.

ये तिजारत की ही एक जायज़ क़िस्म है जिसके नाजा’यज़ होने की कोई शरई वजह नहीं है.असल में एक ही सौदे की दो सूरतों हैं जो नक़द की सूरत में कम क़ीमत पर और क़िस्त की सूरत में ज़्यादा क़ीमत पर फ़रोख़त करने वाला और ख़रीदार के ईजाब-ओ-क़बूल से तय किया जाता है.उधार बेचने की सूरत में सामान की असल क़ीमत में ज़्यादती करना जा’यज़ है.

ये सूद नहीं,लेकिन जिस चीज़ को खरीदा गया है और उस पर जो क़िस्त बांधी गई है,अगर खरीदने वाला वक़्त पर क़िस्त जमा नहीं करता है,फिर उस पर जुर्माना लगाया जाता है तो यह सूद होगा और यह चीज़ इस्लाम में ह’राम है.इस लिए क़िस्तों पर ख़रीद-ओ-फ़रोख़त के लिए ज़रूरी है कि एक ही मजलिस में ये फ़ैसला कर लिया जाये कि ख़रीदार नक़द लेगा या उधार क़िस्तों पर,ताकि इसी के हिसाब से क़ीमत मुक़र्रर की जाये.

इस शर्त के साथ क़िस्तों पर सामान की ख़रीद-ओ-फ़रोख़त करना शरीयत में जा’यज़ है.जब क़िस्त पर कोई सामान खरीदा जाये,तो खरीदते बेचते वक़्त सारे मामले तय कर लिए जाएँ,और हर चीज़ खोल कर बयान का दिया जाये,कि नकद लोगो तो इतने रुपए देने होंगे और क़िस्त पर लोगे तो इतने रुपए ज़्यादा देने होंगे.

इस तरह से जब दोनों लोग बात कर लेंगे और किसी को इस पर एत’राज नहीं होगा तो यह खरीदना बेचना जायज हो जाएगा और अगर यह बातें नहीं हुई हैं,और बाद में बेचने वाला ज़्यादा पैसे मांगता है,या बातें हो गई हैं,और वक़्त पर क़िस्त अदा न कर पाने की वजह से जुर्माना लगाया जा रहा है,तो शरीयत में यह खरीदना बेचना जायज़ नहीं है.
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