अल्लाह उन्हें दौलत देता है जो लोग ये काम करते है…..मौलाना तारिक जमील ने फ़रमाया

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इन्सानी आदतों में सख़ावत यानी अपने माल को अल्लाह के लिए ग़रीबों,ज़रूरतमंदों को देना अल्लाह ताला और अल्लाह ताला के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी बहुत अज़ीज़ है।और ऐसे लोगों को अल्लाह की मख़लूक़ भी पसंद करती है,जो इंसान अल्लाह के राह में गरीबों की मदद करता है,उसे गरीब दुआ देते हैं.

इसके बदले में अल्लाह ताला उन्हें और माल देता है और वह ज़्यादा मालदार हो जाते हैं,अल्लाह ताला के रास्ते में खर्च करने से कभी कमी नहीं आती है.बल्कि अल्लाह ताला की राह में खर्च करने से दौलत बढ़ती रहती है। और वह बंदा अल्लाह ताला का महबूब भी हो जाता है।और इसी तरह सख़ावत की ज़िद यानी कंजूसी, बुख़ालत अल्लाह ताला और अल्लाह ताला के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ लोगों के नज़दीक भी नापसंदीदा अमल है।

सख़ावत को अल्लाह बहुत पसंद फ़रमाता है और कंजूसी को बहुत नापसंद फ़रमाता है।अल्लाह ताला लोगों को ज़्यादा दौलत इसी वजह से देता है,ताकि वह गरीबों पर खर्च करें,और मालदारों के माल में अल्लाह ताला ने गरीबों का हिस्सा रख दिया है।एक हदीस में आता है कि अल्लाह ताला सख़ी को जन्नत अता फ़रमाएगा और कंजूस को जहन्नुम में भेज देगा।

अहादीस पाक में सख़ावत की बहुत फ़ज़ीलत और बुख़ालत की बहुत मुज़म्मत बयान की गई है।अल्लाह ताला के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है दो आदत ऐसी हैं जिन्हें अल्लाह ताला दोस्त रखता है।अव्वल,सख़ावत,दनेक आदत और दो आदत ऐसी हैं जिन्हें अल्लाह नापसंद फ़रमाता है।

अव्वल बुख़ल(कंजूसी),दोम बदखू़ई।(किसी का बुरा चाहना) अल्लाह ताला के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि सख़ी की ग़लती को माफ़ कर द्या जाता है,वह जब तंग दस्त होता है तो अल्लाह ताला उस की दस्त-गीरी फ़रमाता है।सख़ी की सख़ावत उस की हिफ़ाज़त-ओ-सलामती करती है। वो बंदगान-ए-ख़ुदा पर ख़र्च करके माल को कम नहीं करता बल्कि उस का माल बढ़ता ही जाता है। इस में इज़ाफ़ा ही होता है।

अल्लाह ताला की बेशुमार नेअमतों में से एक नेअमत दौलत भी है।अगर दौलत जायज़ और हलाल तरीक़ों से हासिल की और अल्लाह ताला और अल्लाह ताला के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम की रज़ा में ख़र्च की जाये तो ये दौलत उस को समाजी इज़्ज़त भी अता करती और दुनिया व आख़िरत की कामयाबी भी और पूरा समाज उस को सख़ी के नाम से याद करता है।

साभार-islamicmela

अगर आदमी दौलत की मुहब्बत का शिकार हो जाये और दौलत के ज़रीया वो ग़रीबों, बेवा औरतों और यतीमों की मदद ना करे,सदक़ा व ख़ैरात से इस को वास्ता ना रहे।वो पत्थर दिल हो जाये किसी लाचार व नादार और माज़ूर व मजबूर पर भी इस को तरस ना आए तो ऐसा आदमी हर चंद की नमाज़ी हो,हाजी हो,रोज़ादार हो,मुआशरा उस को रद्द कर देता है।लोगों के दिलों में ज़र्रा बराबर उस की इज़्ज़त का जज़बा बाक़ी नहीं रहता।समाज का हर फ़र्द उस को हक़ारत की नज़र से देखता है।

मौलाना तारिक जमील

और कंजूस के नाम से याद करता है।सख़ी व बख़ील का इनाम और अंजाम किया है।इस का ज़िक्र हदीस पाक में इन अलफ़ाज़ में मज़कूर है।सख़ी अल्लाह तआला से क़रीब है जन्नत से क़रीब है लोगों से क़रीब है और दोज़ख़ से दूर है और बख़ील अल्लाह तआला से दूर है जन्नत से दूर है लोगों से दूर है और जहन्नुम से क़रीब है और जाहिल सख़ी ख़ुदा के नज़दीक इबादत गुज़ार बख़ील से कहीं बेहतर है। (तिरमिज़ी शरीफ़)

उमूमन समाज में बख़ील उसी को कहा जाता है जो राह-ए-ख़ुदा में अपना माल ख़र्च ना करे।इसी किस्म के बख़ील के लिए हदीस मुंदरजा बाला में ये वईद मज़कूर हुई कि वो ऐसा कम नसीब है कि वो रहमत ख़ुदावंदी से भी महरूम है,और समाजी इज़्ज़त-ओ-एहतिराम और जन्नत से भी दूर है।ये बुख़ल और कंजूसी ऐसी रज़ील ख़सलत और मज़मूम आदत है कि इस के बाइस एक इन्सान दुनिया में ज़िल्लत व नाकामी का शिकार तो होता ही है, इस की आख़िरत भी तबाह-ओ-बर्बाद हो जाती है।जहन्नुम के भड़कते शोले उस के मुंतज़िरर हते हैं।

ऊपर जो कुछ बयान हुआ,उसका हासिल यह है कि जो शख्स अल्लाह ताला के दिये हुये दौलत में से गरीबों को भी देता हौ,तो उसके दौलत में बढ़ोतरी होती है,और वह और मालदार होता जाता है,अल्लाह ताला उसे पसंद फरमाता है,जबकि जो शख्स माल रहते हुये भी गरीबों की मदद नहीं करता है,तो उसके माल को खतम कर दिया जाता है,और ऐसे शख्स को अल्लाह ताला नापसंद फरमाता है।

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