जानें कौन हैं जस्टिस खलीफुल्ला?,आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट ने दी मध्यस्थता की ज़िम्मेदारी

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अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कल मध्यस्थता को लेकर फैसला सुनाया है।बता दें कि बुधवार को भी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस विवाद को मध्यस्थता के लिए सौंपने या नहीं सौंपने के बारे में बाद में आदेश दिया जायेगा।

आपको बता दें कि इस मामले में निर्मोही अखाड़ा समेत कई अन्य हिन्दू संगठनों ने इस विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का विरोध किया था,जबकि मुस्लिम संगठनों ने इस विचार का समर्थन किया था।सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद मामले को सुलझाने के लिए तीन सदस्यीय पैनल द्वारा मध्यस्थता का आदेश दिया है।

SUPREME COURT

जिसमें हिन्दू धर्मगुरु आर्ट ऑफ लीविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू के साथ इस पैनल के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एफ.एम.आई कलीफुल्ला होंगे।बता दें कि अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जिस शख्स की अगुवाई में इस पैनल का गठन किया है।इस पैनल के अध्यक्ष मुहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला है।पूर्व जस्टिस कलीफुल्ला मूल रूप से तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में कराईकुडी के रहने वाले हैं।

वह सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं।इनका जन्म 23 जुलाई 1951 को हुआ था।बात करें उनके करियर की तो पूर्व जस्टिस ने 20 अगस्त 1975 को लॉ की प्रैक्टिस शुरू की।कलीफुल्ला को पहले मद्रास हाईकोर्ट में स्थाई जस्टिस नियुक्त किया गया।इसके बाद साल 2000 में उनको सुप्रीम कोर्ट में बतौर जस्टिस नियुक्त कर दिया गया।

जबकि 2011 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था।आपको बता दें कि मध्यस्थता का आदेश देते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई,न्यायमूर्ति ए.ए.बोबडे,न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़,न्यायमूर्ति अशोक भूषण व न्यायमूर्ति एस.अब्दुल नजीर ने प्रिंटऔर विजुअल मीडिया दोनों को मध्यस्थता की कार्यवाही की रिपोर्टिग करने से वर्जित कर दिया।

बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग ले रहे लोगों के मीडिया से बात करने पर भी रोक लगा दी।सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक,मध्यस्थता की प्रक्रिया फैजाबाद में एक हफ्ते तक शुरू की जायेगी।यह आदेश चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सुनाया है।उनका कहना है कि अगर अयोध्या मामले में जरूरत पड़ी तो किसी भी तरह की कानूनी सहायता ले सकते हैं।

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