एक बच्चे का रुला देने वाला वाक़िया..सुनकर ईमान ताज़ा हो जायेगा

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मौलाना अब्दुल हननान साहब अपने एक बयान में फरमाते हैं कि एक क़’ब्र पर एक लड़का बैठा हुआ रो रहा था और वह स्कूल का ड्रेस पहने हुये था, वह क़ब्र पर हाथ मार मार कर कह रहा था कि अब्बा बाहर आओ और स्कूल की फीस दे दो,अगर स्कूल की फीस नहीं दोगे तो कल मैं स्कूल से निकाल दिया जाऊंगा।

वहीं उसी क़ब्र के बराबर एक शख्स और बैठा था,वह फोन पर फूल लाने का आर्डर दे रहा था,जिसे उसे अपने बाप के क़ब्र पर चढ़ाना था,जब उस ने बच्चे का रोना सुना तो फूल का आर्डर कैंसल कर दिया और फूल के पैसे इस बच्चे को दे दिये ताकि यह लड़का स्कूल का फीस जमा कर सके।दोस्तों यतीमों की हमेशा मदद करनी चाहिए.

हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सबसे उम्दा व बहतर और निहायत बाबरकत घर उसे क़रार दिया है जिस घर के अंदर कोई यतीम हो और इस के साथ निहायत अच्छा बरताओ किया हो।

अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ये भी कहा है कि निहायत बदतर व बदबख़त इन्सान वो है जो यतीमों के साथ बुरा सुलूक करे और इस के साथ नामुनासिब और दिल तोड़ने वाला बरताओ करे।अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम की ये और इस तरह की तालीमात इसी लिए हैं कि यतीमों के की कफ़ालत करने वाले और मुसीबतज़दा यतीमों पर मुश्तमिल ख़ानदान वाले बददिल वशकसता ख़ातिर ना हों।

और उनके वजूद से उलझन व परेशानी महसूस ना करें बल्कि लोग उसे आपस में एक दूसरे पर सबक़त लेजाने का ज़रीया बनाएँ और बढ़ चढ़ कर उनकी मदद करें,सहारा बनने और ख़बर-गीरी करने में लोग आगे बढ़ने की कोशिश करें।अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यतीमों से मुताल्लिक़ तालीमात से हमें बहरावर करके ये बताया है कि यतीम समाज में बरकत और सआदत का ज़रीया हैं,वो बोझ नहीं।

यही नहीं बल्कि अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यतीमों की कफ़ालत करने वालों को ये ख़ुशख़बरी भी दी है कि वो जन्नत में अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ और बिलकुल क़रीब होंगे।अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: में और यतीम की कफ़ालत करने वाला जन्नत में शहादत और बीच की उंगली की क़ुरबत की तरह क़रीब और मिले होंगे।(सुनन अबी दाऊद)।

हर मुस्लमान जानता है और इस्लामी तारीख़ शाहिद है कि अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम यतीमों के साथ बेपनाह हमदर्दी करते,शफ़क़त का बरताओ करते,उनकी ख़बर-गीरी करते और उनके साथ हुस्न-ए-सुलूक करने की ताकीद व तलक़ीन करते रहते थे।

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