बीबी का ये काम शौहर को बर्बा’द कर देता है …हज़रत अली(र.अ.) ने फ़रमाया

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मौला अली रज़ी अल्लाहु ताला अनहु ने फरमाया है कि जब औरत अपने शौहर की बगावत पर उतर आएगी,तो वह इंसान बर्बाद हो जाएगा।इसलिए हमेशा औरत को समझाते रहें कि वह गुनाहों के रास्ते पर न चले।इसी तरह औरत का भी शौहर को राज़ी करना और ख़ुश करना बड़ी इबादत है।और शौहर को नाख़ुश करना और नाराज़ करना बहुत बड़ा गुनाह है।

अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो औरत पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ती रही और रमज़ान उल-मुबारक के रोज़े रखती रही और अपनी इज़्ज़त को बचाती रही,यानी पाक दामन रही और शौहर की ताबेदारी और फ़र्मांबरदारी करती रही तो इस को इख़तियार है कि जिस दरवाज़ा से चाहे जन्नत में चली जाये।)

अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिस औरत की मौत इस हालत में आए कि इस का शौहर इस से राज़ी हो तो वो जन्नती है। (अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर मैं ख़ुदा के सिवा किसी और को सजदा करने के लिए कहता तो औरत को ज़रूर हुक्म देता कहापने मियां को सजदा क्या करे।

अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम कि जब मर्द अपनी बीवी को अपनी हाजत पूरी करने के लिए बुलाए तो ज़रूर उस के पास आजाए,अगरचे चूल्हे पर बैठी हो ,सब छोड़ छाड़ कर चली आए।जब किसी की बीवी उस की फ़रमांबर्दारी ना करे,उस के हुक़ूक़ अदा ना करे और ख़ुश-उस्लूबी के साथ ज़िंदगी ना गुज़ारे तो क़ुरआन-ए-करीम ने इस की इस्लाह की तरतीब वार तीन तरीक़े बताए हैं,तलाक़ देने से पहले इन बातों पर अमल करना चाहीए।

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पहला तरीक़ा ये है कि शौहर नरमी से बीवी को समझाए,उस की ग़लतफ़हमी दूर करे। अगर वाक़ई वो जान कर ग़लत तारीका इख़तियार किए हुए है तो समझा बुझा कर सही रास्ता इख़तियार करने की तलक़ीन करे.

इस से काम चल गया तो मुआमला यहीं ख़त्म हो गया,औरत हमेशा के लिए गुनाह से और दोनों रंज-ओ-ग़म से बच गए और अगर इस से काम ना चले तो दूसरा दर्जा ये है कि नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए बीवी का बिस्तर अपने से अलयाहदा कर दे और इस से अलयाहदा सोए।

ये एक मामूली सज़ा और बेहतरीन तरीका है,इस से औरत मुतनब्बा हो गई तो झगड़ा यहीं ख़त्म हो गया,और अगर वो इस शरीफ़ाना सज़ा पर भी अपनी ना-फ़रमानी और कज-रवी से बाज़ ना आई तो तीसरे दर्जे में शौहर को मामूली मार मारने की भी इजाज़त दी गई है,जिसकी हद ये है कि बदन पर इस मार का असर और ज़ख़म ना हो।

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मगर इस तीसरे दर्जा की सज़ा के इस्तिमाल को अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पसंद नहीं फ़रमाया,इसलिए इस दर्जा पर अमल करने से बचना बेहतर है।बहरहाल अगर इस मामूली मारपीट से भी मुआमला दरुस्त हो गया,सुलह सफ़ाई हो गई,ताल्लुक़ात बहाल हो गए,तब भी मक़सद हासिल हो गया,शौहर पर भी लाज़िम है कि वो भी बाल की खाल ना निकाले और हर बात मनवाने की ज़िद ना करे,चशमपोशी और दरगुज़र से काम ले और हत्तल इमकान निभाने की कोशिश करे।और अगर इसके बाद भी बीवी अपने आदत में सुधार न लाये,तो उसे तलाक दे सकते हैं।

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