ऐसी कौन सी गलती है जिसे किसी भी सूरत में नही करना चाहिए,पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने फ़रमाया

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हदीस मुबारक है कि عَنْ أَبِي أَيُّوبَ أَنَّ النَّبِيَّ صلی الله عليه وآله وسلم قَالَ إِذَا أَتَيْتُمُ الْغَائِطَ فَلَا تَسْتَقْبِلُوا الْقِبْلَةَ وَلَا تَسْتَدْبِرُوهَا بِبَوْلٍ وَلَا غَائِطٍ وَلَکِنْ شَرِّقُوا أَوْ غَرِّبُوا. قَالَ أَبُو أَيُّوبَ فَقَدِمْنَا الشَّامَ فَوَجَدْنَا مَرَاحِيضَ قَدْ بُنِيَتْ قِبَلَ الْقِبْلَةِ فَنَنْحَرِفُ عَنْهَا وَنَسْتَغْفِرُ اﷲَ.हज़रत अब्बू अय्यूब अंसारी रज़ी अल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि नबी करीम सललल्लाहु अलैहि वाला वसल्लम ने फ़रमाया जब तुम क़ज़ा-ए-हाजत के लिए जाओ तो क़िबला की तरफ़ मुँह करो ना पीठ,चाहे पेशाब करना हो या पाख़ाना,अलबत्ता मशरिक़ या मग़रिब की तरफ़ मुँह किया करो।

हज़रत अब्बू अय्यूब कहते हैं हम मुलक शाम में गए तो वहां क़िबला की जानिब बैत उल-ख़ला बने हुए थे,हम वहां क़ज़ा-ए-हाजत के वक़्त रुख बदल कर बैठते और अल्लाह ताला से मग़फ़िरत चाहते।इस हदीस मुबारक में मगरीब और मशरिक़ की जानिब का ज़िक्र किया गया है,लेकिन यह मदीना शरीफ के लोगों के लिए है,हिंदुस्तान में रहने वाले मगरीब और मशरिक़ की तरफ अगर मुंह या पीठ करेंगे तो क़िबला की तरफ हो जाएगा,इसलिए किसी भी मुल्क में रहें क़िबला की तरफ मुंह या पीठ न करें।

साभार-islamicmela

हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ी अल्लाहु अनहु ने इरशाद फ़रमाया कि हमें अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस से मना फ़रमाया है कि पाख़ाना या पेशाब के वक़्त हम क़िबला की तरफ़ रुख करें, या ये कि हम दाहने हाथ से इस्तिंजा करें,या ये कि हम इस्तंजे में तीन पत्थर से कम इस्तिमाल करें, या ये कि हम किसी चौपाए (ऊंट, घोड़े या बैल वग़ैरा) के फ़ज़्ले(गोबर और लीद वग़ैरा) या हड्डी से इस्तिंजा करें।

ऊपर जो हदीस बयान हुई है उस में पेशाब पाख़ाना करने से मुताल्लिक़ चार हिदायात इरशाद फ़रमाई हैं:क़ज़ा-ए-हाजत के वक़्त किस तरफ़ मुँह किया जाये?क़ज़ा-ए-हाजत के वक़्त इस तरह बैठा जाये कि क़िबले की तरफ़ ना मुँह हो और ना ही पीठ।ये हुक्म क़िबला के अदब-ओ-एहतिराम और तक़द्दुस की ख़ातिर है,कि कोई भी ज़ी-शुऊर इन्सान जो लतीफ़ और रुहानी हक़ीक़तों का इदराक करने वाला हो वो इस मौक़ा पर किसी मुक़द्दस और मुहतरम चीज़ की तरफ़ मुँह या पुश्त करने को बे-अदबी शुमार करते हुए इस तर्ज़ के अपनाने से गुरेज़ करेगा।

इस्तंजा किस हाथ से किया जाये?
दूसरी हिदायत ये दी गई कि इस अमल के लिए अपना दायाँ हाथ इस्तिमाल ना किया जाये,इसलिए कि अल्लाह ताला ने दाएं हाथ को बाएं हाथ पर फ़ौक़ियत दी है,इस हाथ को आला,मुहतरम,मुक़द्दस,साफ़ सुथरे और नफ़ीस कामों के लिए तो इस्तिमाल किया जा सकता है,घटिया और रज़ील कामों के लिए नहीं;दाएं हाथ के शरफ़-ओ-एहतिराम की वजह से इस्तिंजा करते हुए इस्तिमाल नहीं किया जाएगा।बल्कि बायाँ हाथ किया जाएगा।

कितने ढेलों से इस्तंजा किया जाये?
तीसरी हिदायत ये की गई है कि इस्तंजे के लिए कम अज़ कम तीन ढेलों को इस्तिमाल किया जाये,उस की वजह ये थी कि आम तौर पर सफ़ाई तीन पत्थरों से कम में पूरी तरह नहीं होती,इसलिए हुक्म दिया गया कि तीन पत्थर इस्तिमाल कर के अच्छी तरह और मुकम्मल सफ़ाई की जाये,अगर किसी शख़्स की सफ़ाई तीन पत्थरों से हासिल ना हो तो उस के लिए ज़रूरी है कि वो तीन से ज़ाइद पत्थर इस्तिमाल करे,ताकि कामिल सफ़ाई हो जाये।नीज़ हदीस-ए-मज़कूर में पत्थर का ज़िक्र किया गया है, ये उस ज़माने में मिलने वाली आम चीज़ की वजह से था,मौजूदा दौर में शहरों में बने हुए पुख़्ता बैत उल-ख़ला में टवाइलट पेपर इस्तिमाल किया जाये तो इस में भी कोई हर्ज नहीं,इसी तरह पानी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।इसी तरह हर वो पाक चीज़ जिससे सफ़ाई का मक़सद हासिल हो सकता हो और इस का इस्तिमाल इस काम के लिए मौज़ू भी हो और जिस्म के लिए नुक़्सानदेह भी ना हो।

जानवरों के फुज़लात से इस्तंजा करने का हुक्म
चौथी हिदायत ये दी गई है कि इस्तिंजा के लिए किसी जानवर की गिरी पड़ी हड्डी या उनके फ़ज़्ले (लीद,गोबर वग़ैरा)को इस्तिमाल ना किया जाये,दरअसल इस तरह ज़माना-ए-जाहिलियत में कर लिया जाता था,हालाँकि ये फ़ितरत-ए-सलीमा के ख़िलाफ़ है।अहादीस-ए-मुबारका में मुतफ़र्रिक़ तौर पर क़ज़ा-ए-हाजत से मुताल्लिक़ बहुत से अहकामात मज़कूर हैं,नीज़ फुक़हा-ए-किराम ने इन अहादीस की रोशनी में बहुत से मसाइल किताबों में ज़िक्र किए हैं। इन्हें पढ़ना चाहिए,और उस पर अमल करना चाहिए।

क़ज़ा-ए-हाजत से क़बल की मस्नून दुआ
हज़रत जै़द बिन अर्क़म रज़ी अल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:हाजत के इन मुक़ामात में ख़बीस मख़लूक़ शयातीन वग़ैरा रहते हैं, पस तुम में से जब कोई पाखाना पेशाब करने के लिए जाये तो चाहिए कि पहले ये दुआ पढ़े।
أَعُوْذُ بِاللّہِ مِنَ الْخُبُثِ وَ الْخَبائِثِ…तर्जुमा:में अल्लाह की पनाह लेता हूँ ख़बीस जीनों और ख़बीस जिननियों से।

इस दुआ की बरकत से इन्सान का शरीर जिन्नात के असरात से महफ़ूज़ हो जाता है,क्यों कि ये गंदी जगहें जिन्नात-ओ-शयातीन का मस्कन होती हैं और ये मख़लूक़ इन जगहों पर आकर फ़राग़त हासिल करने वालों के साथ छेड़-छाड़ करती है,इसलिए सरकार-ए-दो आलम सललल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ से इस बात की तालीम दी गई कि जब तुम क़ज़ा-ए-हाजत के लिए ऐसी जगहों पर जाओ तो उनके शर से बचने के लिए अल्लाह की पनाह में आ जाया करो,चुनांचे रवायात में आता है कि इस दुआ के पढ़ने वाला शरीर जिन और शरीर जिननियों के असरात से महफ़ूज़ हो जाता है।

क़ज़ा-ए-हाजत का तरीक़ा
जब कोई शख़्स लेट्रिन में जाने का इरादा करे,तो उस के लिए मुनासिब है कि ऐसे वक़्त में ही चला जाये जब इस पर क़ज़ा-ए-हाजत का बहुत ज़्यादा तक़ाज़ा ना हो;बल्कि ये शख़्स इस हालत के तारी होने से पहले पहले ही दाख़िल हो जाये,इस दौरान ये शख़्स अपने साथ कोई ऐसी चीज़ जिस पर अल्लाह का नाम(या कुरान पाक की आयत वग़ैरा लिखी हुई) हो,ना ले जाये,और नंगे सर भी ना जाये,जब दरवाज़े के पास पहुंच जाये तो दाख़िल होने वाली दुआ पढ़ने से क़बल बिसमिल्लाह पढ़े,फिर दुआ पढ़े,फिर बायां पांव अंदर दाख़िल करे,फिर ज़मीन के क़रीब हो कर सत्तर खोले,फिर अपने पांव को क़दरे कुशादा कर के इस तरह बैठे कि इस के बदन का ज़्यादा वज़न बाएं पांव पर हो.

इस हालत में ये शख़्स उख़रवी उमूर (मसलन:इलम-ए-दीन,फ़िक़्ह वग़ैरा ) के बारे में ना सोचे,कोई शख़्स उस को सलाम करे तो उसे जवाब ना दे, आवाज़ उस के कानों में पड़े तो इस का जवाब ना दे,इस हालत में इस को छींक आए तो अलहमदु लिल्लाह ना कहे,अपने आज़ाए मस्तूरा की तरफ़ नज़र ना करे,बदन से निकलने वाली गंदगी की तरफ़ भी ना देखेपाख़ाना पर थूक,नाक की रेंठ,बलग़म वग़ैरा ना थूके, बहुत ज़्यादा देर तक वहां ना बैठे, आसमान की तरफ़ ना देखे, बल्कि मोतदिल कैफ़ीयत के साथ रहे, फिर जिस्म से ख़ारिज होने वाली नजासत को पानी डाल कर अच्छी तरह बहा दे, फिर जब फ़ारिग़ हो जाये तो शर्मगाह के नीचे की जानिब मौजूद रग पर अपनी उंगली फेर के उसे अच्छी तरह पेशाब के क़तरों से ख़ाली कर दे, फिर तीन पत्थरों से अपने उज़ू से नजासत दूर करे, फिर फ़ारिग़ हो के सीधा खड़ा होने से पहले पहले अपने शर्मगाह को छुपा ले, फिर अपना दायाँ पांव बाहर निकाल कर क़ज़ा-ए-हाजत के बाद की दुआ पढ़े । غُفْرَانَکَ، اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِيْ أَذْھَبَ عَنِّيْ الْأَذیٰ وعَافَانِيْ

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