जब छात्र नहीं होंगे तो VC या CM का क्या मतलब रह जाएगा?

जब छात्र नहीं होंगे तो VC या CM का क्या मतलब रह जाएगा?

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7 जून  शाम से लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र जेल की सलाखों के पीछे कुछ लोग उसको दलों से जोड़ कर देख रहे है| हो सकता है कि उसमें  राजनीतिक दलों की भी भूमिका हो लेकिन उससे कहीं ज़्यादा छात्रों की भूमिका है.उन्हें पूरा अधिकार है विरोध करने का काले झंडे दिखने का ,यहाँ तक ही नहीं मै तो समझता हूँ कि यदि ये ताक़त थोड़ी और होती तो मुख्यमंत्री को कैंपस में घुसने नहीं देना चाहिए था क्यूंकि किसी को ये अधिकार नहीं की छात्रों के घर से इकठ्ठा हुई पाई- पाई का वो गलत तरीके से उपयोग करे और उन्ही के पैसों से आयोजन करके छात्रों नवजवानों को गालिया दे|

जिस मुख्यमंत्री का ये विवेक मर चुका है उसे शिक्षण संस्थानों में घुसने देने की कोई आवश्यकता नहीं है| और ये प्रश्न सिर्फ यही तक नहीं है ये सवाल विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता से जुड़ा है आज यदि कुलपति सरकार के पाँव पखारने में लगे है तो उसका कारण है कि उन्हें सरकार ने भेजा है अगर ऐसा नहीं होता तो वित्त अधिकारी के मना करने के बावजूद छात्रों के पैसों से सरकारी प्रोग्राम का आयोजन नहीं करते| वो सरकार के प्रति अपनी भक्ति इसलिए दिखा पा रहे हैं क्यूंकि दास का मालिक के प्रति ये कर्तव्य भी है की यदि मालिक उसपर थोड़ी भी कृपा दिखाए तो दास अपने मालिक के लिए आसमान से तारे तोड़ लाने की चेष्टा करता है|

और यही साबित करने के लिए जो घटना विश्वविद्यालय से बाहर हुई उसमें छात्रों पर कुलपति ने कार्यवाही कर दी और उन्हें निष्काषित कर दिया गया.यदि आज विश्वविद्यालय स्वायत होते तो कुलपति इस क़दर मालिक का ग़ुलाम नहीं होता|और वो इस विरोध को लोकतंत्र की गरिमा के नज़रिये से देखता जो सरकार और विश्वविद्यालय छात्रों का विरोध वो भी अपने द्वारा किये गए ग़लत कार्यों पर नहीं झेल सकती वो सरकार लोकतंत्र विरोधी है|

वो व्यक्ति के महत्त्व को नहीं समझती और लोकतंत्र की गरिमा का उसे ज्ञान नहीं वो एक निरंकुश शासन को पसंद करती है जो सामंती दिमाग की उपज है उन्हें ये साफ़ समझ लेना चाहिए की यदि विश्वविद्यालय अस्तित्व में है |तो इसलिए नहीं कि वो मुख्यमंत्री और ये कुलपति है बल्कि विश्वविद्यालय इसलिए है की छात्र और नवजवान है और अगर छात्र नवजवान विहीन समाज हो जायेगा तो कुलपति और मुख्यमंत्री का कोई मतलब नहीं |

बेहतर होगा मालिक की भूमिका अदा करने के बजाये अपनी वास्तविक भूमिका में रहे और सेवक की तरह सेवा करे मालिक जनता है और जनता ही रहेगी| फैसले लेना और किसी पर टैग लगाना सिर्फ उन्हीं को नहीं आता जनता भी बहुत बेहतर तरीके से ये सब बाते जानती है और इतिहास सदैव इसका गवाह रहा है|
धन्यवाद|
लेखक:ज्योति राय
(ज्योति राय “स्टूडेंट्स मैंडेट” के नाम से ग्रुप चलाते हैं और लखनऊ विश्विद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं)
नोट: लेखक के विचार आज़ाद हैं

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