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अखिलेश ब्रांड इतना पापुलर हो गया कि अपोजीशन के साथ ‘अपने’ भी सहम गये:विकास यादव

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रिपोर्ट -विकास यादव

चुनाव सामने है लेकिन समाजवादी पार्टी विरोधियो से नहीं आपस में लड़ रही है ऐसा लग रहा है पार्टी में दो फाड़ हो चुका है और बस इसका एलान भी हलके हलके दोनों खेमो की तरफ से किया जा रहा है .

साल 2012 के चुनाव नतीजे में एतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव के विरोध को नज़रअंदाज़ करके अचानक अपने पुत्र को  प्रदेश की सत्ता सौप दी .

लेकिन ये पूरा मीडिया जगत के साथ प्रदेश की जनता भी जानती है कि दो साल तक इस सरकार की बागडोर मुलायम सिंह ने शिवपाल यादव के द्वारा अपने हाथ में रखी .

अखिलेश ने फिर भी लैपटाप वितरण जैसी योजनाये लाकर नौज़वानो को आकर्षित करने की कोशिश की लेकिन लोकसभा चुनाए में पार्टी ने बेहद खराब प्रदर्शन किया जिसके लिए मुलायम सिंह ने कई बार सीधे सीधे अपने बेटे को ज़िम्मेदार ठहराया लेकिन शायद यही से अखिलेश ने अपने राजनितिक जीवन की सबसे बड़ी सीख ली और फैसल किया होगा कि हार उनके सर पर गिनी जा रही है तब फिर फैसले भी खद ही लिए जाए.

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अखिलेश ने युवाओ को तरजीह देकर कई योजनाये चलाना शुरू किया साथ ही साथ विकास का खाका तैयार किया ,सूबे को बिजली संकट से निकाला लेकिन जब जब सरकार पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश की तब तब मुलायम सिंह ने अपने बेटे की सरकार के मंत्रियो पर गंभीर आरोप सार्वजनिक रूप से लगाकर टीपू को सुल्तान नही बन्ने दिया.

दरअसल मुलायम ने सपा में एकछत्र राज किया है वो जानते थे जिस तरह एक समय सपा का मतलब मुलायम सिंह था कहीं अखिलेश का मतलब सपा ना हो जाए .

२०१६ शुरू होते ही मुलायम सिंह ने बड़ी खूबसूरती से शिवपाल को आगे कर बेटे को कण्ट्रोल करने का दाव चला लेकिन अखिलेश अब लय हासिल आकर चुके थे शय और मात के खेल में शिवपाल की मंत्री की कुर्सी चली गयी .

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लेकिन पुराने अनुभवी मुलायम ने अपने आखरी दाव को बचाकर रखा इस बीच अखिलेश ने विकास की योजनाओ की छड़ी लगा दी और अपनी ब्रांडिंग बेहतरीन प्लानिंग के साथ की .

अखिलेश ब्रांड से बीजेपी और बसपा को खतरा महसूस होने लगा लेकिन दिसंबर आते आते इस खतरे को मुलायम और शिवपाल ने भी भांप लिया .

राजनीति के धुरंधर महारथी मुलायम और शिवपाल ने अखिलेश को पार्टी में लाचार करने के लिए इस तरह टिकत बाटे कि अखिलेश के ख़ास सभी नेताओ को चून चून कर ठिकाने लगाया गया .

सपा के घोषित उम्मीदवारों की लिस्ट देखकर एहसास हो गया था कि अखिलेश अगर साइलेंट मोड में गये तो खत्म इसलिए ज्यादा उम्मीद बगावत की थी और हुआ भी ऐसा ही .

सुलह और बीच बचाव की कई कोशिशे बेकार साबित हो गयी इसलिए सपा अब टूटकर दो पार्टी बन्ने वाली है ये अलग बात है कि पार्टी की स्थापना करने वाले मुलायम के पास ज्यादा नेता नही बचे है बची है तो बस जिद्द वही अखिलेश के साथ पूरी पार्टी खड़ी है वोटर भी है मगर साइकिल सिम्बल ना होने का मलाल ज़रूर है .

Akhilesh Yadav speaks during a news conference at their party headquarters in Lucknow


अखिलेश के लिए एक दिक्कत ये भी है उनके पास वक़्त अधिक नही है अब उनको फैसले कई करने है गठबंधन में जायेंगे या फिर अकेले लड़ेंगे ,ये सबसे बड़ा सवाल है .

भारत में अब चुनाव चेहरे पर लड़े जाते है इस मामले में अखिलेश यूपी में सबपर भारी है लेकिन अपनों से लड़ाई ऐसी पेचीदा हो गयी है कि ब्रांड कितना कारगार होगा इसका आकलन नही हो पा रहा है .

एक तरफ मुलायम सिंह के विरोध से वोट कितने कम होंगे दूसरी तरफ अखिलेश ने जो अपनी इमेज बनाई है उस पर सपा के गृह युद्द से जनता की सहानुभूति कितनी उनके पास रहेगी .

यूपी के सियासी माहौल को परखने का माद्दा रखने वाले भी अब उलझन में है टीपू के सुल्तान बनने और बाप की खिलाफत का कुल मिला के अखिलेश को फायदा होगा या नुकसांन .

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