झारखण्ड:सीएम पर जूते चप्पल फेंके गये

झारखण्ड:सीएम पर जूते चप्पल फेंके गये

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झारखंड

यहां खरसावां में झामुमो और कई  आदिवासी संगठनों के भारी विरोध के बीच रविवार को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खरसावां के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी।

लोगों ने सीएम को काले झंडे दिखाए और मुख्यमंत्री वापस जाओ के नारे लगाए। साथ ही जूते-चप्पल भी फेंके। हालांकि इस दौरान सीएम लोगों का अभिवादन करते हुए आगे बढ़ते चले गए। आदिवासी संगठन के लोग सीएनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन के खिलाफ में सीएम से नाराज थे।

मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर जैसे ही खरसावां में लैड होने की सूचना मिली। खरसावां शहीद स्थल में झामुमो सहित आदिवासी संगठनों द्वारा सरकार के विरोध में नारेबाजी शुरू कर दी।मुख्यमंत्री का काफिला जैसे ही शहीद पार्क के मुख्यद्वार पहुंचा। वैसे ही उन्हें भारी विरोध का सामना करा पड़ा।

सीएनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन के विरोध में आदिवासी संगठनों ने न सिर्फ मुख्यमंत्री को काले झंडे दिखाए बल्कि उनके खिलाफ नारेबाजी भी की।मुख्यमंत्री खरसावां पार्क के मुख्य गेट तक पहुंचे और वहां से पैदल ही भारी विरोध के बीच शहीद मैदान में प्रवेश कर गए।

समाधि स्थल पर पहले से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे लोगों ने मुख्यमंत्री को लगभग 10 मिनट तक रोके रखा। अन्ततः प्रशासन ने प्रवेश द्वार को बल लगाकर खोला एवं मुख्यमंत्री को प्रवेश कराया।नारेबाजी एवं काले झंडों के बीच मुख्यमंत्री ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री की वापसी के दौरान कुछ लोंगो द्वारा पीछे से चप्पल भी फेंके गए।

मुख्यमंत्री के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद लक्ष्मण गिलुवा, घाटशीला के विधायक लक्षमण टुडू, पूर्व मंत्री बडकुंअर गागराई, जिला अध्यक्ष उदय सिंहदेव, गणेश महाली, अशोक षाडंगी, संजू पांडेय आदि शामिल थे।

झामुमो सहित अन्य संगठनों ने दी थी विरोध की धमकी
मुख्यमंत्री के विरोध की पहले ही योजना बनाई गई थी। झामुमो ने पहले ही घोषणा कर रखी थी कि वह सीएनटी एवं एसपीटी कानून में संशोधन के विरोध में मुख्यमंत्री का शहीदों को श्रद्धांजलि देने नहीं देंगे। प्रशासन ने भी सुरक्षा के सभी इंतजाम कर रखे थे।

क्या है सीएनटी और एसपीटी एक्ट
यह आदिवासियों की भूमि के लिए बनाया हुआ एक कानून है। सीएनटी (छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट) और एसपीटी (संथाल परगना टेनेंसी) में संशोधन का प्रस्ताव झारखंड कैबिनेट की बैठक में पास हुआ।सरकार का तर्क है कि एक्ट में संशोधन से आदिवासी इलाकों में जमीन का स्वरूप बदलने से रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।

आदिवासियों की आर्थिक आमदनी बढ़ेगी, वे अपनी जमीन पर खुद के छोटे उद्योग-धंधे कर सकेंगे।कृषि पर आधारित उद्योग लगाने में भी आसानी होगी। जमीन का आर्थिक महत्व बढ़ेगा तो पलायन पर रोक लगेगी।आदिवासी इलाकों में नए शिक्षण संस्थान खुलेंगे, जिससे स्थानीय बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

विपक्ष क्यों कर रहा विरोध
विपक्षी दलों का मानना है कि सीएनटी और एसपीटी अधिनियम में संशोधन से आदिवासियों और मूलवासियों को नुकसान होगा।कृषि भूमि का गैर कृषि उपयोग किए जाने के लिए अधिनियम में हुए संशोधन से रैयतों का जमीन पर अधिकार नहीं रह जाएगा।
सीएनटी और एसपीटी आदिवासी और मूलवासियों की जमीन को सुरक्षा कवच प्रदान करता है।उनका मानना है कि संशोधन से यह कवच ही समाप्त हो जाएगा और उनकी जमीन औद्योगिक एवं कॉर्पोरेट घरानें को चली जाएगी।