क्या चुनावी सभाओ में टिफिन लेकर चलना भी नोटबंदी के तरह ही साहसिक और ऐतिहासिक क़दम है?

क्या चुनावी सभाओ में टिफिन लेकर चलना भी नोटबंदी के तरह ही साहसिक और ऐतिहासिक क़दम है?

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नई दिल्ली (फैसल अफाक ) – आजकल मीडिया के खबरों के लेवल चुनावी प्रमोशन जैसा हो गया है .८ नवम्बर को पीएम मोदी ने पांच सौ और एक हजार  रूपये के नोट बन करके नये नोट लाने का एलान किया.पीएम मोदी का ये एलान एतिहासिक भी था और साहसी भी जिसको मीडिया ने ठीक ऐसे ही इस तरह के शब्दों से प्रमोशन किया.

मगर सोचने की बात है क्या साहस और इतिहास शब्द का इस्तेमाल करके ऐसे अलंकार देने से ये सबित हो जाता है कि ये फैसला आर्थिक रूप से और देश के लिहाज़ से बिलकूल सही है जैसा कि बताने की कोशिश हुई.

नोटबंदी को साहसिक क़दम बताने पर भाजपा के सीनियर लीडर अरुण शौरी ने भी चुटकी लेते हुए सवाल पूछने वाले पत्रकार से उल्टा पूछ लिया “क्या खुदकुशी करना साहसिक क़दम नही होता है ?”

खैर अब बात करते है एक नए प्रोपेगंडा की ,वाराणसी में पीएम मोदी अपने चुनावी सभा में टिफिन लाने का भरी सभा में एलान करते है .

उसके बाद पीएम मोदी टिफिन का खाना खाते हुए तस्वीरे साझा करते है मोदी एक पार्टी के नेता है भारत के सबसे प्रभावशाली राजनेता है वो मतदाताओ को लुभाने और अपनी पार्टी की तरफ खीचने के हर कोशिश करेंगे .

उनको करना भी चाहिए लेकिन भारत की मीडिया को क्या हो गया है ?

क्या किसी राजनेता का टिफिन खा के प्रचार करना और उसको प्रचारित करना हास्यवद नही है क्या टिफिन में खाना खाने से देश को कोई लाभ होगा या फिर ये अपनी इमेज को चमकाने की कोशिश नही है .

अगर देश को टिफिन में खाना खाने से लाभ नही है और ये किसी ने अपनी इमेज चमकाने के लिए तो मीडिया क्यों इसमें भागीदार बन रहा है ?

और हां एक सवाल पीएम मोदी से भी है , वाराणसी की चुनावी सभा में वो  टिफिन लेकर पहली बार पहुचे थे या फिर इससे पहले भी जाया करते है ?

आखिर में बस इतना ज़रूर जानना चाहता हु क्या चुनावी सभाओ में टिफिन लेकर चलना भी नोटबंदी के तरह ही साहसिक और ऐतिहासिक क़दम है?

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