सुंदर रचना : तु जंजीरो से जकड गया, आगे बढ़ने से रोक गया,

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सुंदर रचना : तु जंजीरो से जकड गया, आगे बढ़ने से रोक गया,
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नई दिल्ली : तु जंजीरो से जकड गया,आगे बढ़ने से रोक गया,

तु जंजीरो से जकड गया,
आगे बढ़ने से रोक गया,
खिला चमन जो मेरा था,
उसको क्यों तु तोड़ गया…

जहन में क्या तेरे आया,
क्यों गुमसुम सा तु चला गया,
यह बात नही मानी मैंने,
रत्नो से रिश्तों को तोड़ गया…

कैसे समझाऊं मैं उस माँ को,
जो करती मनन सदा तेरा,
ज़ब भी देखूं मैं उसको,
चक्षुजल बहाती है वो सदा…

पिता की आँखों में देखूं,
तो बहती गंगा की धारा हैं,
कैसे दिलाऊं धारणा मैं,
कि अब आँखों का तारा नही रहा,
अब आँखों का तारा नही रहा…

क्यों याद नही आई भाई कि,
क्या बहन भी तेरी बैरन थी,
तु तो बसंत सा चला गया,
क्यों किसी कि याद नही आई…

क्या हम सब तेरे बैरी ही थे,
जो मन कि बात नही बोली,
जाते जाते मेरे लक्ष्मण,
अवाज तो राम को दी होती…
अवाज तो राम को दी होती…

दुर तु मुझसे था बैठा,
अगर हुआ हो षड्यंत्र कोई,
तो उन अताताइयों का भी,
होगा निश्चय बुरा ही अंत यही…

अगर विधाता को मंजूर यही,
तो मैं भी हार मानता हूँ,
राम कि इस होनी को,
हंसकर मैं स्वीकारता हूँ,
हां हां हंसकर स्वीकारता हूँ…

       ✍️विकास शुक्ला

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